Skandagupta

Skandagupta  (Hindi, Paperback, prasad Jayashankar)

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Highlights
  • Language: Hindi
  • Binding: Paperback
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Genre: Drama
  • ISBN: 9789326350662
  • Edition: 4th, 2019
  • Pages: 112
Description
स्कन्दगुप्त - 'स्कन्दगुप्त' जयशंकर प्रसाद द्वारा लिखा गया एक ऐतिहासिक नाटक है जो भारतीय इतिहास के एक महत्वपूर्ण कालखण्ड गुप्त साम्राज्य की ऐतिहासिक घटनाओं को आधार बनाकर लेखनीबद्ध किया गया है। यह नाटक गुप्तवंश के प्रसिद्ध सम्राट स्कन्दगुप्त के जीवन पर आधारित है, जिन्होंने पाँचवी सदी में उज्जैन की धरती पर शासन किया और भारत के उत्तर तथा पश्चिम के क्षेत्रों से विदेशी आक्रमणकारियों, शकों और हूणों के साम्राज्य को समाप्त किया। स्कन्दगुप्त के शासनकाल में विदेशी आक्रान्ताओं का आतंक व ब्राह्मण और बौद्ध धर्म के मध्य संघर्ष अपने चरम पर था। जयशंकर प्रसाद ने अपने समय में उन्हीं समस्याओं का सामना किया। उस समय विदेशी आक्रमणकारी अंग्रेज़ थे और ब्राह्मण और बौद्ध की जगह हिन्दू और मुस्लिम थे। 'स्कन्दगुप्त' नाटक का प्रमुख उद्देश्य राष्ट्रीयता-भावना, विश्व-प्रेम, मानवता, लोक कल्याण, सहिष्णुता तथा क्षमाशीलता का प्रचार भी है जिसे प्रस्तुत नाटक में प्रदर्शित भी किया गया है।
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Specifications
Book Details
Imprint
  • Vani Prakashan
Publication Year
  • 2019
Contributors
Author Info
  • जयशंकर प्रसाद - जयशंकर प्रसाद के नाटकों के बिना हिन्दी नाटकों पर की गयी कोई भी बातचीत अधूरी होगी। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने नाट्य विधा को जिस मुकाम पर छोड़ा था, प्रसाद ने अपनी नाट्य सृजन यात्रा वहीं से शुरू की। भारतेन्दु ने अपने समय के नये नाटकों के पाँच उद्देश्य बताये थे—श्रृंगार, हास्य, कौतुक, समाज, संस्कार और देश-वत्सलता। ये सभी प्रसाद के नाटकों में भी मिलते हैं लेकिन प्रसाद की विशेषता यह है कि वे अपने नाटकों को इन उद्देश्यों से आगे ले जाते हैं। उनके नाटकों में राष्ट्रीयता, स्वाधीनता संग्राम और पुनर्जागरण के स्वप्नों को विशेष महत्त्व मिला है। उनकी प्रमुख नाट्य कृतियाँ हैं—विशाख (1921), आजतशत्रु (1922), कामना (1924), जनमेजय का नागयज्ञ (1926), स्कन्दगुप्त (1928), एक घूँट (1930), चन्द्रगुप्त (1931, इसे आरम्भ में 'कल्याणी परिणय' के नाम से लिखा गया था), और ध्रुवस्वामिनी (1933)। कहने की आवश्यकता नहीं कि 'ध्रुवस्वामिनी' प्रसाद के उत्कर्ष काल की रचना है। इसमें उनकी प्रतिभा, अध्यवसाय और कलात्मक संयम—सबके चरम रूप के दर्शन होते हैं। याद रखना चाहिए कि यह वही कालखण्ड है जब वे 'कामायनी' जैसी कालजयी कृति की रचना के लिए आवश्यक तैयारियों में संलग्न रहे होंगे।
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