भुवनेश्वर (1957-1910) हिन्दी के प्रसिद्ध एकांकीकार, लेखक एवं कवि थे। उन्होंने मध्य वर्ग की विडम्बनाओं को कटुसत्य के रूप में उकेरा। उन्हें 'आधुनिक एकांकियों के जनक' होने का गौरव भी प्राप्त है। भुवनेश्वर का पूरा नाम 'भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव ' है । उनका जन्म शाहजहाँपुर के एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। उनके जन्म के कुछ ही वर्षों बाद उनकी माँ का देहान्त हो गया, इस कारण उनको घर में घोर उपेक्षा झेलनी पड़ी। कम उम्र में घर छोड़कर जब इलाहाबाद आये तब शाहजहाँपुर में महज इंटरमीडिएट तक पढ़े भुवनेश्वर के अंग्रेजी-ज्ञान और बौद्धिकता से वहाँ के लेखक और सहपाठी चकित हो गये। आदर्श और यथार्थवाद के उस दौर में इनकी रचनाओं ने दोनों के सीमान्तों को इस प्रकार उद्घाटित किया कि उनके बारे में तरह-तरह की किंवदन्तियाँ फैलने लगीं।
भुवनेश्वर' साहित्य-जगत का ऐसा नाम है, जिसने अपने छोटे-से जीवनकाल में लीक से अलग साहित्य-सृजन किया । एकांकी, कहानी, कविता, समीक्षा जैसी कई विधाओं में भुवनेश्वर ने साहित्य को नये तेवर वाली रचनाएँ दीं। उन्होंने अपनी रचनाओं से आधुनिक संवेदनाओं की नयी परिपाटी विकसित की। प्रेमचन्द जैसे साहित्यकार ने उनको भविष्य का रचनाकार बताया था। इसकी एक खास वजह यह थी कि भुवनेश्वर अपने रचनाकाल से बहुत आगे की सोच के रचनाकार थे। उनकी रचनाओं में कलातीत-बोध है, परन्तु आश्चर्यजनक रूप से यह भूतकाल से न जुड़कर, भविष्य के साथ ज्यादा प्रासंगिक नजर आती है। 'कारवाँ' की भूमिका में स्वयं भुवनेश्वर ने लिखा है कि “विवेक और तर्क तीसरी श्रेणी के कलाकारों के चोर दरवाजे हैं।" उनका यह मानना उनकी रचनाओं में स्पष्टतया द्रष्टिगोचर भी होता है।
- पुस्तक से
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Specifications
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200 gr
Book Details
Imprint
Vani Prakashan
Publication Year
2024
Contributors
Author Info
भुवनेश्वर का जन्म उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर ज़िले में 1910 ई. में हुआ था। उनके पिता का नाम ओंकार बख्श था। अभी भुवनेश्वर डेढ़ साल के ही थे तभी उनकी माता का देहान्त हो गया। उनके लालन-पालन की ज़िम्मेदारी उनकी सौतेली माता पर आ गयी। यहाँ से उनके दुखद जीवन की शुरुआत हुई। अभावों से भरी ज़िन्दगी और परिवार में उपेक्षित जीवन ने उनके व्यक्तित्व को सामान्य नहीं रहने दिया। यद्यपि भुवनेश्वर को अपने चाचा महामाया प्रसाद से काफ़ी स्नेह मिला, लेकिन वह उनके घावों को भरने के लिए नाकाफ़ी था। जब भुवनेश्वर चौदह वर्ष के थे, तभी उनके चाचा का भी देहान्त हो गया। आर्थिक अभाव और परिवार में उपेक्षित महसूस करने वाले भुवनेश्वर को आख़िरकार घर छोड़ना पड़ा।
उनकी प्रारम्भिक शिक्षा शाहजहाँपुर में हुई। इंटरमीडिएट तक की शिक्षा उन्होंने बरेली में प्राप्त की । उच्च शिक्षा के लिए वे इलाहाबाद आ गये। साहित्य में उनकी गहरी रुचि थी। यद्यपि वे मेधावी छात्र थे, लेकिन पाठ्य पुस्तकों में उनका मन कम ही रमता था । अपने छात्र जीवन में ही उन्होंने हिन्दी के अलावा अंग्रेज़ी और उर्दू साहित्य का पर्याप्त अध्ययन कर लिया था ।
उनकी आरम्भिक रचनाएँ प्रेमचन्द की पत्रिका 'हंस' में प्रकाशित हुईं। उनका सम्बन्ध प्रेमचन्द से भी रहा। कुछ अर्से तक वे 'प्रगतिशील लेखक संघ' से भी जुड़े रहे। पढ़ाई छोड़ने के बाद उन्होंने इलाहाबाद और लखनऊ को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। रोटी कमाना उन्हें शायद जीवन का सबसे कठिन और नीरस काम लगता था। उनके विषय में फैली कई तरह की बातों ने उन्हें मशहूर बनाया। वे एक-साथ ही आवारा, जीनियस, पागल सभी समझे जा रहे थे। मृत्यु से लगभग दो साल पूर्व उनकी मानसिक अवस्था अत्यन्त चिन्तनीय हो गयी। 1957 ई. में बनारस की एक धर्मशाला में वे मृत पाये गये। भुवनेश्वर की मृत्यु एक बेचैन जीवन का त्रासद अन्त था ।
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